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Sunday, 10 December 2017

CHIRP- Deaf by choice.



फिर क्या मैं सुनना छोड़ दूँ?
मैं कितनी भी सीधी खड़ी रहूँ , दिखती हमेशा उल्टा हूँ 



लोग कहना नहीं छोड़ते, 
हालात चाहे जैसे भी हों,
जज़्बात चाहे जैसे भी हों, 
लोग कहना नहीं छोड़ते। 

मुस्कुराओ तो 'कुछ जायद ही खुश हो'  की तोहमत लगा देते हैं,
ना हंसो तो कह देते हैं- 'तुम हंसती कम  हो.'
देर से आऊं तो पूछते हैं  'इतनी देर कहाँ लग गयी?'
जल्दी आऊं तो कहते हैं  'क्या काम नहीं है?'
किसी पे भरोसा किया तो बहुत जल्दी भरोसा कर लिया,
और ना किया तो बड़ी देर लगा दी। 

प्रकाश में रहूँ तो उनकी आँखें चौधियाँ जाती हैं,
अँधेरे में मैं उन्हें दिखाई नहीं देती।
थोड़ा बहुत थोड़ा हो जाता है,
और ज्यादा कुछ ज्यादा ही। 
झूठ  बोलूं तो झूठी होने का दाग लगा देते हैं,
सच बोलूं तो उसके कड़वे होने के डर से सता देते हैं. 

कहीं भी जाऊं, कुछ भी कर लूँ ,
लोग कहना नहीं छोड़ते। 
हालात चाहे जैसे भी हों,
जज़्बात चाहे जैसे भी हों, 
लोग कहना नहीं छोड़ते। 

पैसे काम खर्च करो तो मुझे कंजूस कहते हैं, 
पैसे ज्यादा खर्च करो तो फ़िज़ूलख़र्ची का  इलज़ाम लगाते हैं। 
आगे बढ़कर किसी की मदद करो तो दयालू होने पर सवाल उठते हैं,
ना करूँ तो स्वार्थी होने  का ताना कसते हैं। 

तेज़ी से चलूँ या धीमे ,
दुर्घटना का भय लोग मुझे सौंप जाते हैं। 
आसमान में उड़ाना चाहूँ,
तो गिराने की चेतावनी दे जाते हैं,
ज़मीन पर रहूँ तो कहते है- 'मुझे ऊँचा उठाना नहीं आता ' 
पिघल जाऊं तो मुझे संवेदी कहते हैं,
सख्त हो जाऊं तो असंवेदनशील होने का आरोप लगा देते हैं। 

कहीं भी जाऊं , कुछ भी कर लूँ ,
लोग कहना नहीं छोड़ते। 
हालात चाहे जैसे भी हों ,
जज़्बात चाहे जैसे भी हों ,
लोग कहना नहीं छोड़ते। 

मन की बात अगर मन में रखूं तो - 'तुम छुपाती बहुत हो',
और अगर बयां कर दूँ तो - 'तुम कुछ जायद ही व्यक्त कर देती हो। '
समझता कोई नहीं पर कहना सबकी जरुरत है ,
क्या कभी संतुष्ट कर पाऊँगी मैं इन लोगों को ?
इनके संतोष की सीमा क्या है , कैसी है ?
यह वह पहेली है  जो मैं पूरी ज़िन्दगी सुलझाती रहूंगी। 

खुद को बेक़सूर साबित करना असंभव है ,
और कसूरवार मैं  हूँ नहीं। 
फिर सोचा शायद प्यार की भाषा में स्वीकृति मिले,
अफ़सोस, प्यार पर भी संदेह करते हैं,
जितना दो, कम  पड़  जाता है,
और इसके विपरीत मुझे कुछ आता नहीं. 

इस दुविधा में ज़िन्दगी बसर कर रही हूँ ,
की हिसाब किताब से ज़िन्दगी कैसे चलाऊं ?
गणित में हमेशा से कमज़ोर जो रही हूँ। 
कहीं भी जाऊं , कुछ भी कर लूँ ,
लोग कहना नहीं छोड़ते। 
हालात चाहे जैसे भी हों ,
जज़्बात चाहे जैसे भी हों ,
जीते भी मरने के बाद भी ,
लोग कहना नहीं छोड़ते। 
मेरी सौ बात दरकिनार ,
आखरी बात लोगों की होती है,
मेरे  सौ सच भी मैले  से,
आखरी बात  लोगों की होती है। 


अब सोचती हूँ,
मैं उन्हें सुनना छोड़ दूँ,
कहेगें बहरी है।   
पर जब सुनती थी तब भी उनके लिए मैं बहरी ही थी,
उनको खुश करने की कोशिशें बेकार रही ,
अब खुद  को खुश करने मैं निकल पड़ी। 


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FourCloverLife

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